Saturday, 18 January 2014

गाथा नं . 3 असंतुलित द्वेष दु:खात परिवरर्तित होतो

गाथा नं .3 

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"असंतुलित द्वेष दु:खात परिवरर्तित होतो  "
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काव्यानुवाद : 
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मारीले , हरविले , लुटले , शिवी दिली असे ।
चिंती जो मनी सदा ऐसे, वैर तयाचे शमत नसे ।।३।।
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भावार्थ : 
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"दुसऱ्याने मला मारले , हरविले , लुटले , शिवी दिली,अपमान केला,असे जेंव्हा मनुष्य विचार करतो तेंव्हा त्याचे वैर कधी हि शांत होत नाही . " 

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