गाथा नं .3
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"असंतुलित द्वेष दु:खात परिवरर्तित होतो "
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काव्यानुवाद :
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मारीले , हरविले , लुटले , शिवी दिली असे ।
चिंती जो मनी सदा ऐसे, वैर तयाचे शमत नसे ।।३।।
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भावार्थ :
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"दुसऱ्याने मला मारले , हरविले , लुटले , शिवी दिली,अपमान केला,असे जेंव्हा मनुष्य विचार करतो तेंव्हा त्याचे वैर कधी हि शांत होत नाही . "
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