Sunday, 19 January 2014

गाथा नं . ४ "मैत्रीनेच वैर शांत होते "






गाथा नं . ४ 


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"मैत्रीनेच वैर शांत होते "

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काव्यानुवाद : 

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मारीले , हरविले , लुटले , मला शिवी दिली असे 
चिंती न मनी जो ऎसे, वैर तयाचे शमत असे ।।४।।
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भावार्थ : 
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"दुसऱ्याने मला मारले , मला हरविले , मला लुटले , मला शिवीगाळ केली , असा जेंव्हा मनुष्य विचार करीत नाही , तेंव्हा त्याचे वैर शांत होते . 

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