गाथा नं . ४
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"मैत्रीनेच वैर शांत होते "
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काव्यानुवाद :
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मारीले , हरविले , लुटले , मला शिवी दिली असे
चिंती न मनी जो ऎसे, वैर तयाचे शमत असे ।।४।।
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भावार्थ :
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"दुसऱ्याने मला मारले , मला हरविले , मला लुटले , मला शिवीगाळ केली , असा जेंव्हा मनुष्य विचार करीत नाही , तेंव्हा त्याचे वैर शांत होते .
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